Radha Krishna deities adorned with flower garlands on temple altar with pink backdrop
    Krishna sacred lotus feet divine symbols spiritual worship
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    विभावरी शेष — प्रातः जागरण भजन

    रचयिता: श्रील भक्तिविनोद ठाकुर — कल्याण-कल्पतरु, नाम-कीर्तन गीत 2

    विश्व-भर के इस्कॉन मन्दिरों में ब्राह्ममुहूर्त के प्रथम कीर्तन के रूप में गाया जाता है

    ‘विभावरी शेष’ श्रील भक्तिविनोद ठाकुर रचित प्रातःकालीन जागरण भजन है (कल्याण-कल्पतरु, उच्छ्वास: नाम-कीर्तन गीत 2)। यह जीव को आग्रह करता है कि सूर्योदय से पूर्व उठकर भगवान हरि के पवित्र नामों का — मुकुंद, मुरारि, राम, कृष्ण, हयग्रीव, नृसिंह, मधुसूदन, गोविंद, राधिका-रमण आदि — गान करे और दिन का प्रारम्भ कृष्ण-स्मरण से करे।

    हम कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी श्रील प्रभुपाद के चरण कमलों में हार्दिक कृतज्ञता अर्पित करते हैं, जिनकी अहैतुकी कृपा से यह दिव्य गीत विश्व भर के साधकों तक पहुँचा है।

    सुझाव: रिकॉर्डिंग चलाइए और साथ-साथ इन पवित्र नामों का पाठ कीजिए — ब्राह्ममुहूर्त की साधना, घर के कार्य, यात्रा या टहलते समय अभ्यास के लिए उत्तम।

    श्लोक (देवनागरी लिप्यन्तरण)

    (1)

    विभावरी शेष, आलोक-प्रवेश, निद्रा छाड़ि' उठो जीव बोलो हरि हरि, मुकुंद मुरारि, राम कृष्ण हयग्रीव

    (2)

    नृसिंह वामन, श्री-मधुसूदन, ब्रजेंद्र-नंदन श्याम पूतना-घातन, कैटभ-शातन, जय दाशरथि-राम

    (3)

    यशोदा दुलाल, गोविंद-गोपाल, वृंदावन पुरंदर गोपी-प्रिय-जन, राधिका-रमण, भुवन-सुंदर-बर

    (4)

    रावणान्तकर, माखन-तस्कर, गोपी-जन-वस्त्र-हारी ब्रजेर राखाल, गोप-वृन्द-पाल, चित्त-हारी बंशी-धारी

    (5)

    योगीन्द्र-वंदन, श्री-नंद-नंदन, ब्रज-जन-भय-हारी नवीन नीरद, रूप मनोहर, मोहन-बंशी-बिहारी

    (6)

    यशोदा-नंदन, कंस-निसूदन, निकुंज-रस-विलासी कदम्ब-कानन, रास-परायण, बृंदा-विपिन-निवासी

    (7)

    आनंद-वर्धन, प्रेम-निकेतन, फूल-शर-योजक काम गोपांगना-गण, चित्त-विनोदन, समस्त-गुण-गण-धाम

    (8)

    यमुना-जीवन, केली-परायण, मानस-चन्द्र-चकोर नाम-सुधा-रस, गाओ कृष्ण-जश राखो वचन मन मोर

    हिन्दी अनुवाद

    1) रात्रि का अंत हो गया है और भोर का प्रकाश प्रवेश कर रहा है। हे जीव, उठो और अपनी नींद त्याग दो। भगवान हरि के पवित्र नामों का जप करो — मुक्तिदाता, मुर राक्षस के शत्रु, परम आनन्ददाता, सर्व-आकर्षक और अश्वमुख अवतार हयग्रीव।

    2) भगवान हरि (कृष्ण) ने आधे मनुष्य आधे सिंह नृसिंह रूप में अवतार लिया। वे वामन ब्राह्मण (उपेन्द्र) रूप में प्रकट हुए और मधु राक्षस के वधकर्ता हैं। वे व्रजराज नन्द महाराज के प्रिय पुत्र हैं, श्याम वर्ण के हैं, पूतना के संहारक और कैटभ के विनाशक हैं। दशरथ-पुत्र भगवान राम के रूप में अवतीर्ण हरि की जय हो।

    3) वे माता यशोदा के दुलारे हैं; गायों, भूमि और आध्यात्मिक इन्द्रियों को आनन्द देने वाले हैं और गायों के रक्षक हैं। वे वृन्दावन के अधिपति, गोपियों के प्रियतम, राधिका के प्रेमी और समस्त लोकों में सर्वाधिक सुन्दर व्यक्तित्व हैं।

    4) रामचन्द्र रूप में उन्होंने रावण का अन्त किया; कृष्ण रूप में बड़ी गोपियों का मक्खन चुराया; यमुना में स्नान करती छोटी गोपियों के वस्त्र चुराये। वे व्रज के ग्वाले और ग्वालों के रक्षक हैं; सबके चित्त को हर लेते हैं और सदा बांसुरी धारण करते हैं।

    5) भगवान कृष्ण की पूजा श्रेष्ठ योगीन्द्र करते हैं; वे नन्द-नन्दन हैं और व्रजवासियों के सब भय हर लेते हैं। उनका रंग नवीन वर्षा-मेघ के समान है, उनका रूप मनोहर है। बांसुरी बजाते हुए विचरण करते समय वे अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होते हैं।

    6) वे यशोदा-नन्दन और कंस-निसूदन हैं; निकुंजों में रस-लीला करते हैं। कृष्ण कदम्ब वृक्षों के नीचे रास-नृत्य में लीन रहते हैं और वृन्दावन के वन में निवास करते हैं।

    7) वे अपने भक्तों के आनन्द को बढ़ाते हैं। वे समस्त प्रेम के भण्डार और दिव्य कामदेव हैं जो अपने पुष्प-बाणों से गोपियों की प्रेम-इच्छाएं बढ़ाते हैं। वे गोपियों के हृदय-विनोदक और समस्त शुभ गुणों के धाम हैं।

    8) भगवान कृष्ण यमुना नदी के जीवन हैं; सदा प्रेम-लीलाओं में लीन रहते हैं और गोपियों के मन-रूपी चकोर पक्षियों के लिए चन्द्रमा के समान हैं। हे मन, मेरी इन वाणियों का पालन करो और इन अमृतमय पवित्र नामों के रूप में श्री कृष्ण के यश का गान करो।

    टिप्पणी

    श्रील प्रभुपाद ने स्वयं इस गीत का तात्पर्य समझाते हुए कहा है — सूर्योदय के पश्चात् सोना वैदिक जीवन के विरुद्ध है; जैसे ही जागें, भगवान के पवित्र नामों का जप करें, यही स्वस्थ एवं आध्यात्मिक जीवन का प्रारम्भ है।

    आध्यात्मिक महत्त्व

    विभावरी शेष जीव को जड़-निद्रा छोड़कर भगवद्-स्मरण में जागृत होने का आह्वान है। एक ही गीत में भगवान कृष्ण के अनेक प्रमुख नामों एवं लीलाओं का संक्षेप में दर्शन होता है, अतः इसे ‘नाम-कीर्तन’ की श्रेणी में रखा गया है।

    शास्त्रीय स्रोत और परम्परा

    ‘कल्याण-कल्पतरु’ श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की प्रसिद्ध भजन-संग्रह पुस्तक है। ‘विभावरी शेष’ इसके उच्छ्वास खण्ड के नाम-कीर्तन शीर्षक में दूसरा गीत है, जो गौड़ीय वैष्णव परम्परा में प्रातःकालीन गायन के लिए विशेष रूप से प्रतिष्ठित है।

    कब गाएँ

    ब्राह्ममुहूर्त में (प्रातः 4 से 5 बजे) उठने के तुरन्त बाद; मंगल आरती के समय जागरण भजन के रूप में; अथवा जब भी मन-इन्द्रियाँ निद्रा या तमस् से भरी हों।

    आचार्यों की टीका

    श्रील प्रभुपाद बताते हैं कि भगवान के नाम उनकी लीलाओं के अनुसार चुने जाते हैं — मधु राक्षस का वध करने से ‘मधुसूदन’, पूतना के संहार से ‘पूतना-घातन’, रावण-वध से ‘दाशरथि-राम’। इस प्रकार एक ही भजन में अनेक अवतार-लीलाओं का स्मरण कर साधक प्रातःकाल से ही कृष्ण-चिन्तन में डूब जाता है।

    आध्यात्मिक लाभ

    तमस्-भरी निद्रा से मुक्ति, ब्राह्ममुहूर्त-साधना का सूत्रपात, पूरे दिन की चेतना का आध्यात्मिक रंग में रंग जाना, और हरिनाम-स्मरण की दृढ़ आदत का विकास।

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    विभावरी शेष क्या है?

    यह श्रील भक्तिविनोद ठाकुर रचित प्रातःकालीन जागरण भजन है, जिसमें वे जीव को आग्रह करते हैं कि सूर्योदय से पूर्व उठकर भगवान हरि के पवित्र नामों का गान करे।

    इसे कब गाया जाता है?

    इसे ब्राह्ममुहूर्त में, मंगल आरती के समय अथवा प्रातः उठते ही प्रथम भजन के रूप में गाया जाता है।

    क्या मैं इसे रिकॉर्डिंग के साथ सीख सकता/सकती हूँ?

    हाँ — रिकॉर्डिंग चलाइए और साथ-साथ देवनागरी लिप्यन्तरण से पढ़ते जाइए। कुछ ही दिनों में यह कण्ठस्थ हो जाएगा।

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