महा प्रसादे गोविन्दे — प्रसाद-स्वीकार पूर्व प्रार्थना
रचयिता: श्लोक 1 — महाभारत; श्लोक 2–3 — श्रील भक्तिविनोद ठाकुर
इस्कॉन मन्दिरों में भोजन (प्रसाद) ग्रहण से ठीक पूर्व प्रतिदिन गायी जाती है
‘महा प्रसादे गोविन्दे’ इस्कॉन मन्दिरों में प्रसाद ग्रहण से पूर्व गायी जाने वाली प्रसिद्ध प्रार्थना है। प्रथम श्लोक महाभारत से लिया गया है, और शेष दो श्लोक श्रील भक्तिविनोद ठाकुर द्वारा रचित हैं। यह जिह्वा-नियन्त्रण, प्रसाद-महिमा और कृष्ण-कृपा के दिव्य सम्बन्ध को संक्षेप में स्थापित करती है।
हम कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी श्रील प्रभुपाद के चरण कमलों में हार्दिक कृतज्ञता अर्पित करते हैं, जिनकी अहैतुकी कृपा से ‘महा प्रसादे गोविन्दे’ प्रार्थना विश्व भर के इस्कॉन मन्दिरों में प्रतिदिन गायी जाती है।
सुझाव: रिकॉर्डिंग चलाइए और प्रत्येक भोजन से पूर्व साथ-साथ इन श्लोकों का पाठ कीजिए — कुछ ही दिनों में यह कण्ठस्थ हो जाएगी।
श्लोक (देवनागरी लिप्यन्तरण)
(1)
महा-प्रसादे गोविन्दे नाम-ब्रह्मणि वैष्णवे स्वल्प-पुण्य-वतां राजन् विश्वासो नैव जायते (महाभारत)
(2)
(भाइ-रे!) शरीर अविद्या-जाल, जड़ेन्द्रिय ताहे काल, जीवे फेले विषय-सागरे ता'र मध्ये जिह्वा अति, लोभमय सुदुर्मति, ताके जेता कठिन संसारे
(3)
कृष्ण बड़ दयामय, करिबारे जिह्वा जय, स्व-प्रसाद-अन्न दिलो भाइ सेइ अन्नामृत खाओ, राधा-कृष्ण-गुण गाओ, प्रेमे डाक चैतन्य-निताइ जय श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द श्री अद्वैत गदाधर श्रीवास आदि गौर भक्त वृन्द हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे
हिन्दी अनुवाद
1) हे राजन्! जिन्होंने थोड़े ही पुण्य कर्म संचित किये हैं, उनके भीतर महा-प्रसाद, श्री गोविन्द, पवित्र हरि-नाम और वैष्णवों के प्रति विश्वास कभी उत्पन्न नहीं होता।
2) हे भाइयों! यह भौतिक देह अविद्या का जाल है और जड़ेन्द्रियाँ काल-स्वरूप शत्रु हैं, क्योंकि वे जीव को विषयों के समुद्र में फेंक देती हैं। उनमें भी जिह्वा सर्वाधिक लोभी और दुर्मति है; इसको जीतना संसार में अत्यन्त कठिन है।
3) हे भाइयों! कृष्ण अत्यन्त दयालु हैं — जिह्वा को जीतने के लिए ही उन्होंने अपने प्रसाद-अन्न का अमृत हमें दिया है। अब इस अन्नामृत का सेवन करते हुए राधा-कृष्ण के गुण-कीर्तन करो और प्रेम से चैतन्य-नित्यानन्द का नाम पुकारो।
टिप्पणी
इस्कॉन मन्दिरों में प्रसाद से पूर्व इस प्रार्थना का सामूहिक गायन प्रसाद-तत्त्व को स्मरण कराता है — हम केवल पेट भरने के लिए नहीं, अपितु कृष्ण-कृपा स्वीकार करके अपनी जिह्वा एवं मन को आध्यात्मिक बनाने के लिए भोजन करते हैं।
आध्यात्मिक महत्त्व
महा प्रसादे गोविन्दे एक संक्षिप्त किन्तु अति गहन प्रार्थना है जो प्रसाद-सेवन को मात्र भोजन नहीं, अपितु साधना बना देती है। यह स्पष्ट करती है कि चारों वस्तुओं — महा-प्रसाद, गोविन्द, हरि-नाम और वैष्णव — पर विश्वास सुकृति का परिणाम है, और जिह्वा-जय का एकमात्र सरल मार्ग प्रसाद-सेवन है।
शास्त्रीय स्रोत और परम्परा
प्रथम श्लोक महाभारत से है, जो वैष्णव शास्त्रों में बहुधा उद्धृत किया जाता है। द्वितीय और तृतीय श्लोक श्रील भक्तिविनोद ठाकुर (1838–1914) रचित हैं; उन्होंने अनेक प्रसिद्ध बंगाली एवं संस्कृत भजन रचे जो आज भी गौड़ीय मन्दिरों में गाए जाते हैं।
कब गाएँ
प्रत्येक भोजन (विशेषतः मन्दिर के प्रसाद) से पूर्व; गृह-प्रसाद-सेवा के समय; इष्ट-गोष्ठियों एवं भण्डारों में; और बच्चों को प्रसाद-तत्त्व सिखाते समय।
आचार्यों की टीका
श्रील प्रभुपाद कहते हैं कि जिह्वा सबसे प्रबल इन्द्रिय है, और जिह्वा-जय किये बिना अन्य इन्द्रियों पर विजय असम्भव है। कृष्ण ने प्रसाद-रूप में स्वयं को ही दिया है — इसे ग्रहण करते समय राधा-कृष्ण के गुण-कीर्तन के साथ ‘चैतन्य! नित्यानन्द!’ का उद्घोष करना ही द्रुत भगवत्-प्राप्ति का सरलतम साधन है।
आध्यात्मिक लाभ
जिह्वा-नियन्त्रण, कर्म-बन्धन से मुक्ति, चेतना का शुद्धिकरण, भोजन को साधना में परिवर्तित कर देना, और हरि-नाम के प्रति निरन्तर अनुराग का विकास।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महा प्रसादे गोविन्दे क्यों गायी जाती है?
इसको प्रसाद से पूर्व इसलिए गाया जाता है कि भक्त स्मरण रखे — यह केवल भोजन नहीं, अपितु कृष्ण-कृपा है; इसका सेवन जिह्वा को जीतने और हरि-नाम में रूचि उत्पन्न करने का साधन है।
प्रथम श्लोक का स्रोत क्या है?
प्रथम श्लोक महाभारत से है; द्वितीय और तृतीय श्लोक श्रील भक्तिविनोद ठाकुर की रचना हैं।
क्या इसे घर पर भोजन से पूर्व गाया जा सकता है?
हाँ — हर भक्त को घर के प्रत्येक भोजन के पूर्व इसका गायन करना चाहिए। इससे साधारण आहार भी प्रसाद-तुल्य हो जाता है।



