श्री श्री गुर्वाष्टकम्
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर द्वारा रचित गुरुदेव की महिमा का स्तोत्र।
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के प्रति कृतज्ञता के साथ।
श्लोक 1
संसार-दावानल-लीढ-लोक / त्राणाय कारुण्य-घनाघनत्वम् । प्राप्तस्य कल्याण-गुणार्णवस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: जो आध्यात्मिक गुरु संसार रूपी दावानल (भयंकर अग्नि) में जल रहे जीवों का उद्धार करने के लिए दया के घने मेघ के समान हैं, उन कल्याणकारी गुणों के सागर श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 2
महाप्रभोः कीर्तन-नृत्य-गीत / वादित्र-माद्यन्-मनसो रसेन । रोमाञ्च-कम्पाश्रु-तरङ्ग-भाजो / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: जो श्री चैतन्य महाप्रभु के संकीर्तन में नृत्य, वादन और गायन करते हुए कृष्ण-प्रेम के रस में मग्न रहते हैं, और जिनके शरीर में रोमांच, कम्प तथा अश्रुओं की तरंगें उठती हैं, उन श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 3
श्री-विग्रहारधन-नित्य-नाना / शृङ्गार-तन्-मन्दिर-मार्जनादौ । युक्तस्य भक्तांश् च नियुञ्जतोऽपि / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: जो श्री श्री राधा-कृष्ण अर्चा-विग्रह की सेवा, नित्य नाना प्रकार के शृंगार और मंदिर के मार्जन (सफाई) आदि कार्यों में स्वयं संलग्न रहते हैं तथा अपने शिष्यों को भी इस सेवा में लगाते हैं, उन श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 4
चतुर्-विध-श्री-भगवत्-प्रसाद / स्वाद्व्-अन्न-तृप्तान् हरि-भक्त-सङ्घान् । कृत्वैव तृप्तिं भजतः सदैव / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: जो भगवान् को अर्पित चार प्रकार के स्वादिष्ट प्रसादों (चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खाने वाले) से हरि-भक्तों को तृप्त करते हैं और भक्तों को तृप्त देखकर स्वयं परम संतोष का अनुभव करते हैं, ऐसे श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 5
श्री-राधिका-माधवयोर् अपार / माधुर्य-लीला गुण-रूप-नाम्नाम् । प्रति-क्षणास्वादन-लोलुपस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: जो श्री श्री राधा-माधव के अपार माधुर्यमयी लीलाओं, उनके दिव्य गुणों, रूपों और मंगलमय नामों का प्रति-क्षण आस्वादन करने के लिए लालायित रहते हैं, उन श्री गुरुदेव के चरण कमलों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 6
निकुञ्ज-यूनो रति-केलि-सिद्ध्यै / या यालिभिर् युक्तिर् अपेक्षणीया । तत्राति-दाक्ष्याद् अति-वल्लभस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: वृन्दावन के निकुंजों में श्री श्री राधा-कृष्ण की प्रेममयी लीलाओं की सिद्धि के लिए गोपियाँ जो भी योजनाएँ बनाती हैं, उनमें श्री गुरुदेव अत्यंत दक्षता से सहायता करते हैं, इसलिए वे भगवान को अत्यंत प्रिय हैं। ऐसे श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 7
साक्षाद्-धरित्वेन समस्त-शास्त्रैर् / उक्तस् तथा भाव्यत एव सद्भिः । किन्तु प्रभोर् यः प्रिय एव तस्य / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: समस्त शास्त्रों द्वारा श्री गुरुदेव को साक्षात् श्री हरि के समान ही बताया गया है, और सभी संत उन्हें इसी रूप में मानते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे भगवान के अत्यंत प्रिय और अंतरंग सेवक हैं। ऐसे श्री गुरुदेव के कमल चरणों की मैं वंदना करता हूँ।
श्लोक 8
यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो / यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि । ध्यायन् स्तुवंस् तस्य यशस् त्रि-सन्ध्यं / वन्दे गुरोः श्री-चरणारविन्दम् ॥
अर्थ: श्री गुरुदेव की कृपा से ही भगवान की कृपा प्राप्त होती है, और बिना उनकी कृपा के जीव की कहीं भी कोई गति नहीं है। इसलिए मैं प्रतिदिन तीनों संध्याओं (सुबह, दोपहर, शाम) में उनके यश का ध्यान एवं गान करते हुए, उन श्री गुरुदेव के चरण कमलों की वंदना करता हूँ।



