Radha Krishna deities adorned with flower garlands on temple altar with pink backdrop
    Krishna sacred lotus feet divine symbols spiritual worship
    ← English पर वापस जाएँ

    अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध:

    जगन्नाथ अष्टकम PDF डाउनलोड करें

    निःशुल्क प्रिंट योग्य PDF — रथ यात्रा 2026 के सत्संग में साझा कीजिए |

    जगन्नाथ अष्टकम् और रथ यात्रा 2026

    श्री जगन्नाथ अष्टकम् केवल एक स्तुति नहीं है — यह एक जीवंत प्रार्थना है जो प्रत्येक वर्ष रथ यात्रा के दिन साक्षात् फलित होती है | प्रत्येक श्लोक का समापन इसी प्रार्थना से होता है — 'जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे' अर्थात् 'वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में सदैव प्रकट हों |' रथ यात्रा 2026 — गुरुवार, 16 जुलाई 2026 — के दिन करोड़ों भक्त पुरी धाम में भगवान् जगन्नाथ के दर्शन करेंगे जब वे अपने विशाल रथ नंदीघोष पर सवार होकर बड़ दांडा (मुख्य मार्ग) पर अवतरित होंगे — और इसी क्षण में अष्टकम् की प्रार्थना साक्षात् पूर्ण होती है |

    रथ यात्रा में जगन्नाथ अष्टकम् क्यों गाया जाता है?

    विश्वभर के इस्कॉन मंदिरों में जगन्नाथ अष्टकम् रथ यात्रा कीर्तन का स्थायी अंग है | श्रील प्रभुपाद जी ने 1967 में सैन फ्रांसिस्को में पहली बार भारत के बाहर रथ यात्रा प्रारंभ की, और तभी से यह स्तोत्र इस्कॉन की रथ यात्रा का प्राण रहा है | जब रथ चलना प्रारंभ करता है, तब यह स्तोत्र गाया जाता है और सम्पूर्ण यात्रा में पुनः-पुनः ध्वनित होता है | स्कन्द पुराण के अनुसार रथ यात्रा के दर्शन — या यहाँ तक कि उसका श्रवण — भी अपार पुण्य प्रदान करता है |

    जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे

    वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में सदैव प्रकट हों — मुझे उनके निरंतर दर्शन प्राप्त हों |

    रथ यात्रा 2026 — मुख्य तिथियाँ

    रथ यात्रा (रथ महोत्सव), पुरीगुरुवार, 16 जुलाई 2026
    देवताओं का गुंडिचा मंदिर पहुँचना16 जुलाई 2026 (सायं)
    गुंडिचा मंदिर में निवास16 – 23 जुलाई 2026 (7 दिन)
    बहुड़ा यात्रा (वापसी रथ यात्रा)शुक्रवार, 24 जुलाई 2026

    रथ यात्रा के तीन पवित्र रथ

    अष्टकम् का तीसरा श्लोक रथ यात्रा के दृश्य का ही वर्णन करता है — भगवान् जगन्नाथ अपने बलवान भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ | रथ यात्रा में प्रत्येक देव का अपना रथ होता है:

    • भगवान् जगन्नाथनंदीघोष (चक्रध्वज). 45 फीट ऊँचा, 16 पहियों वाला, लाल और पीले वस्त्र से सुसज्जित |
    • भगवान् बलभद्रताळध्वज. 45.6 फीट ऊँचा, 14 पहियों वाला, लाल और हरे वस्त्र से सुसज्जित |
    • देवी सुभद्रादेवदलन (दर्पदलन). 44.6 फीट ऊँचा, 12 पहियों वाला, लाल और काले वस्त्र से सुसज्जित |

    रथ यात्रा में जगन्नाथ अष्टकम् कैसे गाएँ

    1. अग्रणी-प्रत्युत्तर शैली: एक भक्त प्रत्येक श्लोक का नेतृत्व करे और संगति ध्रुवपद 'जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे' का प्रत्युत्तर दे |
    2. मृदंग और करताल के साथ मध्यम, ध्यानमय लय में गाएँ — स्तुति के अनुरूप |
    3. आठों श्लोकों को क्रम से गाएँ और अंत में ध्रुवपद को कई बार दोहराएँ |
    4. सर्वोत्तम समय: जब रथ चलना प्रारंभ करे, यात्रा के मध्य, और गुंडिचा मंदिर (अथवा स्थानीय गंतव्य) पर पहुँचने पर |

    घर पर रथ यात्रा 2026 कैसे मनाएँ

    यदि आप पुरी की रथ यात्रा में सम्मिलित नहीं हो सकते, तो गुरुवार, 16 जुलाई 2026 की प्रातः घर से ही इस पावन उत्सव का पालन करें:

    1. जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा देवी का चित्र अथवा विग्रह स्थापित करें |
    2. ताज़े पुष्प, धूप और घी का दीपक अर्पित करें |
    3. श्री जगन्नाथ अष्टकम् (आठों श्लोक) पूर्ण भक्तिभाव से गाएँ |
    4. तत्पश्चात् हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करें |
    5. प्रसाद अर्पित करें और परिवार तथा पड़ोसियों में बाँटें |

    हम कृतज्ञता के साथ श्रील ए॰ सी॰ भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी, इस्कॉन के संस्थापक-आचार्य, के चरण कमलों में नमन करते हैं, जिनकी अहैतुकी कृपा से यह स्तोत्र और विश्वव्यापी रथ यात्रा आन्दोलन सर्वत्र पहुँच रहे हैं |

    श्रीजगन्नाथाष्टकम् — जगन्नाथ अष्टकम

    स्तोत्र का इतिहास | जब आदि शंकराचार्य प्रथम बार पुरी धाम स्थित जगन्नाथ (श्री कृष्ण) जी के दर्शन के लिए पहुंचे, तो भगवान् को देखकर उन्होंने जगन्नाथ जी की स्तुति की ओर अष्टकम का निर्माण किया | यह जगन्नाथ स्वामी का सबसे अधिक प्रचलित स्तोत्र है | इसे चैतन्य महाप्रभु जी ने गाया जब वह जगन्नाथ जी के दर्शनों के लिए आये थे | यह पावन ओर शक्तिशाली अष्टक है जिसके पाठमात्र से जगन्नाथ स्वामी प्रसन्न हो जाते है, मनुष्य की आत्मा पापो से मुक्त होकर विशुद्ध हो जाती है | इस अष्टकम के पाठ से आत्मा पवित्र होकर अंत में विष्णु लोक को प्राप्त करती है | हर वैष्णव को मुक्ति देने वाला यह स्तोत्र भगवन जगन्नाथ जी को अतिशय प्रिय है |

    हम कृतज्ञता के साथ अपने परम पूज्य गुरुदेव श्रील ए॰ सी॰ भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद जी, इस्कॉन के संस्थापक-आचार्य, के चरण कमलों में नमन करते हैं, जिनकी अहैतुकी कृपा से यह दिव्य स्तोत्र विश्व भर के भक्तों तक पहुँच रहा है |

    श्लोक एवं अर्थ

    श्लोक 1

    कदाचित् कालिन्दी_तटविपिन_सङ्गीतकरवो मुदाभीरीनारी_वदनकमलास्वादमधुपः । रमाशम्भुब्रह्मा मरपतिगणेशार्चितपदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥१॥

    अर्थ: हे प्रभु ! आप कदाचित जब अति आनंदित होते है, तब कालिंदी तट के निकुंजों में मधुर वेणु नाद द्वारा सभी का मन अपनी ओर आकर्षित करने लगते हो, वह सब गोपबाल ओर गोपिकाये ऐसे आपकी ओर मोहित हो जाते है जैसे भंवरा कमल पुष्प के मकरंद पर मोहित रहता है, आपके चरण कमलो को जोकि लक्ष्मी जी, ब्रह्मा, शिव, गणपति ओर देवराज इंद्र द्वारा भी सेवित है ऐसे जगन्नाथ महाप्रभु मेरे पथप्रदर्शक हो, मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |


    श्लोक 2

    भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूळं नेत्रान्ते सहचर_कटाख्यं विदधते । सदा श्रीमद्वृन्दावनवसतिलीलापरिचयो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥२॥

    अर्थ: आपके बाए हस्त में बांसुरी है और शीश पर मयूर पिच्छ तथा कमर में पीत वस्त्र बंधा हुआ है, आप अपने कटाक्ष नेत्रों से तिरछी निगाहो से अपने प्रेमी भक्तो को निहार कर आनंद प्रदान कर रहे है, और अपनी लीलाओ का जो की वृन्दावन में आपने की उनका स्मरण करवा रहे है और स्वयं भी लीलाओ का आनंद ले रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बनकर मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |


    श्लोक 3

    महाम्भोधेस्तीरे कनकरुचिरे नील शिखरे वसनप्रासादान्तः सहजबलभद्रेण बलिना । सुभद्रामध्यस्थः सकल सुरसेवावसरदो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥३॥

    अर्थ: हे मधुसूदन ! विशाल सागर के किनारे, सूंदर नीलांचल पर्वत के शिखरों से घिरे अति रमणीय स्वर्णिम आभा वाले श्री पूरी धाम में आप अपने बलशाली भ्राता बलभद्र जी और आप दोनों के मध्य बहन सुभद्रा जी के साथ विध्यमान होकर सभी दिव्य आत्माओ, भक्तो और संतो को अपनी कृपा दृष्टि का रसपान करवा रहे है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथपर्दशक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |


    श्लोक 4

    कृपापारावारो सजलजलदोश्रेणिरुचिरो रमावाणीरामः स्फुरदमलपद्मेख्यण सुख। सुरेन्द्रैराराध्यः श्रुतिगणशिखागीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥४॥

    अर्थ: जगन्नाथ स्वामी दया और कृपा के अथाह सागर है, उनका रूप ऐसा है जैसे जलयुक्त काले बादलो की गहन श्रंखला हो, अर्थात अपनी कृपा की वृष्टि करने वाले मेघो के जैसे है, आप श्री लक्ष्मी और सरस्वती को देने वाले भण्डार है, अर्थात आप अपनी कृपा से लक्ष्मी और सरस्वती प्रदान करते है, आपका मुख चंद्र पूर्ण खिले हुए उस कमल पुष्प के समान है जिसमे कोई दाग नहीं है अर्थात पूर्ण आभायुक्त खिले हुए पुण्डरीक के जैसा आपका मुखकमल है, आप देवताओ और साधु संतो द्वारा पूजित है, और उपनिषद भी आपके गुणों का वर्णन करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक हो और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |


    श्लोक 5

    रथारूढो गच्छन्पथि मिलितभूदेवपटलैः स्तुति प्रादुर्भावं प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः । दयासिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धुसुतया जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥५॥

    अर्थ: हे आनंदस्वरूप ! जब आप रथयात्रा के दौरान रथ में विराजमान होकर जनसाधारण के मध्य उपस्थित होते हे तो अनेको ब्राह्मणो, संतो, साधुओ और भक्तो द्वारा आपकी स्तुति वाचन, मंत्रो द्वारा स्तुति सुनकर प्रसन्नचित भगवान् अपने प्रेमियों को बहुत ही प्रेम से निहारते हे, अर्थात अपना प्रेम वर्षण करते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी लक्ष्मी जी सहित जोकि सागर मंथन से उत्पन्न सागर पुत्री है मेरे पथप्रदर्शक बने और मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करे |


    श्लोक 6

    परंब्रह्मापीडः कुवलयदलोत्फुल्लनयनो निवासी नीलाद्रौ निहितचरणोऽनन्तशिरसि । रसानन्दो राधासरसवपुरालिङ्गनसुखो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥६॥

    अर्थ: जगन्नाथ स्वामी आप ब्रह्मा के शीश के मुकुटमणि है, और आपके नेत्र कुमुदिनी की पूर्ण खिली हुयी पंखुड़ियों के समान आभा युक्त है, आप नीलांचल पर्वत पर रहने वाले है, आपके चरणकमल अनंत देव अर्थात शेषनाग जी के मस्तक पर विराजमान है, आप मधुर प्रेम रस से सराबोर हो रहे है जैसे ही आप श्रीराधा जी को आलिंगन करते है, जैसे कमल किसी सरोवर में आनंद पता है, ऐसे ही श्री जी का हृदय आपके आनंद को बढ़ाने वाला सरोवर है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक और शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |


    श्लोक 7

    न वै प्रार्थ्यं राज्यं न च कनकमाणिक्यविभवं न याचेऽहं रम्यां निखिलजनकाम्यां वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथपतिना गीतचरितो जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥७॥

    अर्थ: हे मधुसूदन ! मैं न तो राज्य की कामना करता हूँ, ना ही स्वर्ण, आभूषण, कनक माणिक एवं वैभव की कामना कर रहा हूँ, न ही लक्ष्मी जी के समान सुन्दर पत्नी की अभिलाषा से प्रार्थना कर रहा हूँ, मैं तो केवल यही चाहता हूँ की प्रमथ पति (भगवान् शिव) हर काल में जिन के गुण का कीर्तन श्रवण करते है वही जगन्नाथ स्वामी मेरे पथप्रदर्शक बने एवं शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |


    श्लोक 8

    हर त्वं संसारं द्रुततरमसारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिमपरां यादवपते । अहो दीनेऽनाथे निहितचरणो निश्चितमिदं जगन्नाथः स्वामी नयनपथगामी भवतु मे ॥८॥

    अर्थ: हे देवो के स्वामी, आप अपनी संसार की दुस्तर माया जोकि मुझे भौतिक सुख साधनो और स्वार्थ साधनो की आकांक्षा के लिए अपनी ओर घसीट रहे है, अर्थात अपनी ओर लालायित कर रहे है, उनसे मेरी रक्षा कीजिये, हे यदुपति ! आप मुझे मेरे पाप कर्मो के गहरे ओर विशाल सागर से पार कीजिये जिसका कोई किनारा नहीं नज़र आता है, आप दीं दुखियो के एकमात्र सहारा हो, जिस ने अपने आपको आपके चरण कमलो में समर्पित कर दिया हो, जो इस संसार में भटककर गिर पड़ा हो, जिसे इस संसार सागर में कोई ठिकाना न हो, उसे केवल आप ही अपना सकते है, ऐसे जगन्नाथ स्वामी मुझे शुभ दृष्टि प्रदान करने वाले हो |

    जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः । सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥ इति श्रीमद् शङ्कराचार्यप्रणीतं जगन्नाथाष्टकं सम्पूर्णं ॥

    भगवान् जगन्नाथ के बारे में

    भगवान् जगन्नाथ श्री कृष्ण के एक रूप हैं जिनकी पूजा पुरी, ओडिशा में होती है | वे अपने बड़े भ्राता बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजमान रहते हैं | प्रसिद्ध रथ यात्रा (रथ महोत्सव) भगवान् जगन्नाथ की यात्रा का उत्सव है | ये आठ श्लोक उनके दिव्य रूप, लीलाओं और भक्तों पर उनकी अहैतुकी कृपा का गुणगान करते हैं |

    अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

    जगन्नाथ अष्टकम् किसने रचा?

    श्री जगन्नाथ अष्टकम् की रचना 8वीं शताब्दी के आचार्य आदि शंकराचार्य ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर के दर्शन के समय की थी | इसमें आठ संस्कृत श्लोक हैं और प्रत्येक श्लोक के अंत में यह प्रार्थना है — 'जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे' |

    'नयन पथ गामी भवतु मे' का अर्थ क्या है?

    इसका अर्थ है — 'वे जगन्नाथ स्वामी मेरे नेत्रों के मार्ग में सदैव प्रकट हों, अर्थात मुझे उनके निरंतर दर्शन प्राप्त हों |' यह भक्त की सबसे गहरी प्रार्थना है |

    रथ यात्रा 2026 कब है?

    जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को मनाई जाएगी | वापसी यात्रा (बहुड़ा यात्रा) 24 जुलाई 2026 को होगी | यह आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि को मनायी जाती है |

    रथ यात्रा में जगन्नाथ अष्टकम् क्यों गाया जाता है?

    रथ यात्रा के दिन भगवान् जगन्नाथ स्वयं अपने मंदिर से निकलकर प्रत्येक भक्त को दर्शन देते हैं — ठीक वही जो अष्टकम् प्रार्थना करता है | इसलिए रथ यात्रा के लिए यह सबसे उपयुक्त स्तोत्र है |

    क्या इस्कॉन में जगन्नाथ अष्टकम् गाया जाता है?

    हाँ | श्रील प्रभुपाद जी ने 1967 में सैन फ्रांसिस्को में पहली बार भारत के बाहर रथ यात्रा प्रारंभ की, और तभी से जगन्नाथ अष्टकम् इस्कॉन की रथ यात्रा कीर्तन का अभिन्न अंग है |

    रथ यात्रा में तीन रथों के नाम क्या हैं?

    भगवान् जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, बलभद्र का रथ ताळध्वज, और सुभद्रा देवी का रथ देवदलन (दर्पदलन) कहलाता है |

    श्रील आदि शंकराचार्य द्वारा रचित — पारंपरिक वैष्णव स्तोत्रों में से एक, जिसे श्री श्री जगन्नाथ-बलदेव-सुभद्रा के भक्त गाते हैं |

    Spiritual Significance

    Jagannathashtakam is the prayer of a devotee who wants nothing — no kingdom, no wealth, no pleasure — except the constant darshan of Lord Jagannatha. Its closing refrain 'jagannathah svami nayana-patha-gami bhavatu me' is one of the most cherished prayers in Vaishnavism.

    Scriptural Source & Tradition

    Traditionally attributed to Sri Adi Shankaracharya. Glorified by all four Vaishnava sampradayas and central to the Ratha Yatra celebrations in Puri and around the world.

    Commentary from the Acharyas

    Srila Prabhupada personally led the worldwide Ratha Yatra movement and instructed devotees to glorify Lord Jagannatha as the merciful form of Krishna who comes out of His temple to give darshan even to the most fallen. This prayer is the perfect mood for such a devotee.

    When to Sing / Chant

    Ratha Yatra (Festival of Chariots — next: Thursday, July 16, 2026 in Puri), Snana Yatra, Niladri Bije, before Jagannatha deity darshan, and during Purushottama month.

    Benefits for the Devotee

    Invokes the personal mercy of Lord Jagannatha, qualifies one for the rare gift of His darshan, dissolves material ambition, and connects the chanter to the global sankirtana mission centered on Ratha Yatra.

    Gratitude to His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Srila Prabhupada

    We offer our humble obeisances at the lotus feet of our founder-acharya, His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Srila Prabhupada, without whose causeless mercy the priceless prayers, bhajans and sacred literature of the Gaudiya Vaishnava tradition would have remained inaccessible to most of the world. By his herculean preaching efforts, his unparalleled translations and his founding of the International Society for Krishna Consciousness (ISKCON), the holy names, pastimes and instructions of Sri Sri Radha-Krishna and Sri Chaitanya Mahaprabhu are today chanted in every town and village.

    nama om vishnu-padaya krishna-preshthaya bhu-tale
    srimate bhaktivedanta-svamin iti namine
    namas te sarasvate deve gaura-vani-pracharine
    nirvishesha-shunyavadi-pashchatya-desha-tarine

    All glories to Srila Prabhupada. All glories to the Vaishnava acharyas in the disciplic succession.

    Lord Jagannath Baladeva Subhadra deities temple darshan
    Srila Prabhupada founder ISKCON spiritual master portrait